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विशेष सेवा और सुविधाएँ

बाजार में निष्पक्ष और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का अग्रदूत
विशेष लेख

विशेष लेख

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग

 

डॉ शीतल कपूर *

 

बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा उपभोक्ताओं को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर वस्तुओं और सेवाओं की विस्तृत श्रृंखला तक सुगम पहुंच को सुनिश्चित करती है। व्यावसायिक उद्यम अपने हितों की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की रणनीतियों और युक्तियों को अपनाते हैं। वे अधिक शक्ति और प्रभाव प्राप्त करने के लिए एक साथ मिल जाते हैं जो उपभोक्ताओं के हितों के लिए हानिकारक हो सकता है और कई बार उनके द्वारा गलत प्रकार से मूल्य निर्धारण, कीमत बढ़ाने के लिए जानबूझकर उत्पाद आगत में कटौती, प्रवेश के लिए अवरोध का निर्माण, बाजारों  का आवंटन, बिक्री में गठजोड़, अधिक मूल्य निर्धारण और भेदभावपूर्ण मूल्य निर्धारण जैसी पद्धतियां अपनाई जाती हैं जिसका विभिन्न हित समूहों के समाजिक और आर्थिक कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए न केवल एकाधिकार अथवा व्यापारिक संयोजनों के गठन को रोकना आवश्यक है बल्कि एक निष्पक्ष और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना भी आवश्यक है ताकि उपभोक्ताओं को अपनी खरीद का बेहतर मोल प्राप्त हो सके।

अर्थव्यवस्था में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सृजन और इस संदर्भ में सबको समान अवसर प्रदान करने के लिए संसद द्वारा 13 जनवरी 2003 को प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 को लागू किया गया। 14 अक्टूबर 2003 से केन्द्र सरकार द्वारा भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) की स्थापना की गई। इसके बाद प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अधिनियम, 2007 द्वारा इस अधिनियम में संशोधन किया गया। 20 मई 2009, को प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौते और प्रमुख स्थितियों के दुरुपयोग से संबंधित अधिनियम के प्रावधानों को अधिसूचित किया गया। यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर के अलावा संपूर्ण भारत में लागू होता है। एक अध्यक्ष और छह सदस्यों के साथ भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग पूरी तरह से कार्यात्मक है। प्रतिस्पर्धा आयोग चार प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केन्द्रित करता है- प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते, प्रमुख स्थितियों का दुरुपयोग, संयोजन विनियमन और प्रतिस्पर्धा हिमायत। प्रतिस्पर्धा की जांच के लिए अधिनियम व्यवहारजन्य दृष्टिकोण पर बल देता है। यह एमआरटीपी अधिनियम के दृष्टिकोण से अलग है जिसमें संरचनात्मक दृष्टिकोण को अपनाया गया था।

 

देश के आर्थिक विकास के मद्देनजर प्रतिस्पर्धा अधिनियम में प्रतिस्पर्धा आयोग की स्थापना का प्रावधान है ताकि निम्नलिखित उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके-

·   प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली पद्धतियों को रोकना

·   बाजार में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और इसे बनाए रखना

·   उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना

·   भारतीय बाजार में अथवा इसके अलावा आनुषांगिक जुडे मामलों के लिए अन्य प्रतिभागियों द्वारा किए जाने वाले व्यापार की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना

 

 

प्रतिस्पर्धा अधिनियम के द्वितीय अध्याय के तहत निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं-

·   यू/एस 3 प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौतो का निषेध

·   यू/एस 4 प्रभुत्व के दुरुपयोग की रोकथाम

·   यू/एस 5 संयोजनों (विलय और अधिग्रहण) का विनियमन

·   यू/एस 6 भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के प्रस्तावित दस सदस्यों की स्थापना,आयोग के अधिकारीगण और शक्तियां

 

प्रतिस्पर्धा अधिनियम की प्रस्तावना-

अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग को निम्नलिखित प्रयत्न करने चाहिए-

·   बाजारों को उपभोक्ताओं के लाभ और कल्याण के लिए तैयार करें।

·   अर्थव्यवस्था के तीव्र और सतत वृद्धि तथा विकास के लिए देश की आर्थिक गतिविधियों में निष्पक्ष और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को सुनिश्चित करें।

·   आर्थिक संसाधनों के सर्वाधिक प्रभावी इस्तेमाल के उद्देश्य के साथ प्रतिस्पर्धा नीतियों को लागू करें।

·   प्रतिस्पर्धा कानून के अनुसार क्षेत्रीय नियामन कानूनों के सहज क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्रीय नियामकों के साथ प्रभावी रिश्तों और पारस्परिक प्रभाव का विकास करना।

·   प्रभावी रुप से प्रतिस्पर्धा की हिमायत करना और भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धात्मक संस्कृति की स्थापना और पोषण के लिए सभी हितधारकों के बीच प्रतिस्पर्धा के लाभ के बारे में जानकारी का प्रसार करना।

 

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए हालिया फैसले में प्रतिस्पर्धा कानून के उद्देश्यों को और अधिक रेखांकित किया गया है-

प्रतिस्पर्धा कानून का प्रमुख उद्देश्य उपभोक्ता की प्राथमिकता के अनुकूल बाजार के सृजन में प्रतिस्पर्धा को सहायक साधन के रुप में प्रयोग करते हुए आर्थिक दक्षता का संवर्धन करना है। उचित प्रतिस्पर्धा का लाभ त्रिस्तरीय है- आवंटनीय दक्षता- जो संसाधनों के प्रभावी आवंटन को सुनिश्चित करती है, उत्पादक दक्षता- जो उत्पादन लागत की न्यूनतम और गतिशील दक्षता को सुनिश्चित करती है, जो अभिनव पद्धतियों को सुनिश्चित करती है। (2010 की दीवानी अपील संख्या-7999 में 9 सितंबर 2010 को दिया गया फैसला)

 

कौन सीसीआई से संपर्क कर सकते हैं-

यदि कोई व्यक्ति, उद्यम अथवा संघ प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते, प्रमुख स्थितियों, विलयन और अधिग्रहण के दुरुपयोग तथा प्रतिस्पर्धा में बाधा डालने वाले संयोजन में शामिल हो तो सीसीआई से संपर्क किया जा सकता है।

यदि कोई निर्माता अथवा सेवा प्रदाता अपने उत्पाद अथवा सेवा की बिक्री पर अनुचित शर्त लगाता है तो उपभोक्ता इसके निवारण के लिए सीसीआई को सूचित कर सकते हैं। उपभोक्ता वस्तुओं का व्यापार, बैंकिंग, शिक्षा, वित्तपोषण, बीमा, अचल संपत्ति, परिवहन, प्रसंस्करण, विद्युत अथवा ऊर्जा घटक की आपूर्ति आदि ऐसे प्रमुख क्षेत्र है जहां काफी संख्या में उपभोक्ता प्रतिस्पर्धा आयोग से लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

 

कौन शिकायत कर सकता है-

कोई भी व्यक्ति, उपभोक्ता, उपभोक्ता संघ अथवा व्यापार संघ प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते और प्रमुख स्थितियों के दुरुपयोग के खिलाफ शिकायत कर सकता है-

 

 

·   व्यक्ति में कोई शख्स, अविभाजित हिंदू परिवार (एचयूएफ), कंपनी, फर्म, व्यक्तियों का संघ (एओपी), व्यक्तियों का निकाय (बीओआई), सांविधिक निगम, सांविधिक प्राधिकरण, कृत्रिम वैधिक व्यक्ति, स्थानीय प्राधिकारी और भारत से बाहर गठित निकाय शामिल है।

·   उपभोक्ता ऐसा व्यक्ति है जो व्यक्तिगत इस्तेमाल अथवा अन्य प्रयोजन से खरीद करता है।

 

सीसीआई के कार्य

·   भारत के प्रतिस्पर्धा आयोग को जांच प्रक्रिया द्वारा प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते, और एकाधिकार के दुरुपयोग को रोकने तथा संयोजनों (विलयन अथवा गठजोड अथवा अधिग्रहण) के नियामन का कार्य करना चाहिए।

·   किसी भी कानून (सांविधिक अधिकार)  के तहत गठित प्राधिकरण/केन्द्र सरकार से प्राप्त संदर्भ के संबंध में प्रतिस्पर्धा मुद्दे पर अपना मत देना चाहिए।

·   सीसीआई को प्रतिस्पर्धा मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा की हिमायत, जन जागरुकता और प्रशिक्षण भी प्रदान करने का अधिदेश है।

 

केन्द्र सरकार अथवा कोई राज्य सरकार अथवा किसी भी कानून के तहत गठित प्राधिकरण जांच के लिए संदर्भ दे सकता है। आयोग के द्वारा स्वंय अपनी जानकारी अथवा ज्ञान के आधार पर जांच शुरु की जा सकती है। प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते और प्रमुख स्थितियों के दुरुपयोग के मामलों में आयोग निम्नलिखित आदेश पारित कर सकता है-

 

·   जांच के दौरान आयोग एक पार्टी को प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते अथवा प्रमुख स्थिति के दुरुपयोग से रोककर अंतरिम राहत प्रदान कर सकता है।

·   उद्यम के सकल कारोबार का अधिकतम 10 प्रतिशत जुर्माना और कार्टेल के संबंध में कार्टेल से प्राप्त लाभ की तीन गुना राशि अथवा उद्यम के सकल कारोबार का दस प्रतिशत, जो भी अधिक हो।

·   जांच के बाद आयोग दोषी उद्यम को प्रतिस्पर्धा विरोधी समझौते अथवा प्रमुख स्थिति के दुरुपयोग से दूर रहने और इसमें दोबारा प्रवेश न करने का निर्देश दे सकता है।

·   मुआवजा प्रदान करवाना

·   समझौते में सुधार लाना

·   यदि कोई उद्यम प्रभावशाली स्थिति का लाभ उठा रहा है तो केन्द्र सरकार को इसके विभाजन की संस्तुति करना।

(पसूका फीचर)

 

*** 

नोट: इस लेख में लेखक द्वारा व्‍यक्‍त वि‍चार उनके अपने हैं और यह जरूरी नहीं है कि‍ वे पीआईबी के वि‍चारों को प्रति‍बि‍म्‍बि‍त करें।

 

* एसोसिएट प्रोफेसर और समन्वयक उपभोक्ता क्लब, वाणिज्य विभाग, कमला नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

 

वि. कासोटिया/विजयलक्ष्‍मी/-

पूरी सूची-



 



 

 

 



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