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देश-दुनिया को बेहतर बनाती सहकारी संस्‍थाएं
अंतर्राष्‍ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 और सहकारिता सप्‍ताह 14-20 नवम्‍बर के अवसर पर

अंतर्राष्‍ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 और सहकारिता सप्‍ताह 14-20 नवम्‍बर के अवसर पर

विशेष लेख                    

*नरेश कुमार सिंह

पूरे विश्‍व में भारत सहित 100 से अधिक देशों में सरकारी और निजी क्षेत्र के समानांतर, सहकारी क्षेत्र भी अपनी विशिष्‍ट उपयोगिता और महत्‍व के साथ कार्यरत हैं। सहकारी संस्‍थाओं को भी ‘’लोकतांत्रि‍क सरकार की तरह-जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए-गठित संस्‍थाएं माना जाता है। पूंजी और उद्योगों के विकेंद्रीकरण, आम जनता, खासकर गरीबों-कमजोर वर्गों के उत्‍थान, देश-समाज में समावेशी, समतामूलक विकास को प्रोत्‍साहित करने, गरीब और अमीर के बीच आमदनी के अंतर को कम करने तथा समाज में आपसी सौहार्द-प्रेम को बढ़ावा देने में सहकारी संस्‍थाओं की महत्‍वपूर्ण भू‍मिका को देखते हुए इस क्षेत्र को विशेष सम्‍मान के साथ देखा जाता है।

बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था वाले देश अमरीका में सहकारी संस्‍थाओं के स्‍थान और भूमिका पर नजर डालकर भी इसे समझा-या महसूस किया जा सकता है। अमरीका की 30 हजार सहकारी संस्‍थाओं में लगभग 20 लाख व्‍यक्‍त‍ि काम करते हैं। विश्‍व की प्रतिष्ठित पत्रिका  ‘‘कोस्‍च्‍यून द्वारा हर वर्ष चुने जाने वाले कार्य करने की दृष्‍ट‍ि से 100 सर्वश्रेष्‍ठ स्‍थानों की सूची में नियमित रूप से अमरीकी सहकारी संस्‍थाओं का भी नाम आता रहता है। कुछ देशों के सहकारी महासंघों/परिसंघों की सदस्‍यता के साथ 1895 में गठि‍त-इंटरनेशनल को-ऑपरेटिव एलायंस (आईसीए)-यानी अंतर्राष्‍ट्रीय सहकारी गठबंधन के 100 से अधिक देश सदस्‍य हैं। यह संगठन सहकारिताओं की विशिष्‍ट आवश्‍यकताओं के अनुरूप उनका कानूनी विनियमनकारी और सिद्धांतपरक ढांचा तैयार करता है। सदस्य देशों के साथ-साथ यह सहकारिता को बढ़ावा देने के ध्‍येय से अंतर-सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों के साथ भी तालमेल रखता है।  संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने देश-दुनिया को बेहतर बनाने में सहकारी क्षेत्र की सराहनीय भूमिका को देखते हुए वर्ष 2012 को अंतर्राष्‍ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया है।

आईसीए की ‘‘ग्‍लोबल-300’’ रिपोर्ट के आधार पर विश्‍व में सहकारी क्षेत्र के परिदृश्‍य पर गौर करें तो हम पाते हैं कि दु‍निया में 300 सबसे बड़ी सहकारिताओं का कारोबार एक खरब 60 अरब डालर तक पहुंच गया है जो कई बड़े देशों के सकल घरेलू उत्‍पाद (जीडीपी) के बराबर है। रूस, ब्राजील, भारत और अफ्रीका की केवल चार प्रतिशत जनता ही निजी क्षेत्र की विभिन्‍न कंपनियों की शेयर धारक है जबकि उनकी 15 प्रति‍शत जनता सहकारी संस्‍थाओं की सदस्‍य है। केन्‍या के जीडीपी में उसकी सहकारी संस्‍थाओं का योगदान 45 प्रतिशत में न्‍यूजीलैंड के जीडीपी में 22 प्रतिशत है।

जहां तक अपने देश की स्थिति का सवाल है तो अपनी छह लाख सहकारी समितियों के 25 करोड़ सदस्‍यों के साथ भारत विश्‍व में सहकारी आंदोलन का सि‍रमौर बन चुका है। अपनी कृषि‍आधारि‍त ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था की तो यह रीढ़ की हड्डी माना जाता है।

 

 देश में शायद ही ऐसा कोई गांव कस्‍बा, नगर, महानगर शेष हो जहां कि‍सी न कि‍सी रूप में सहकारी संस्‍थाओं ने अपनी पहचान नहीं बनायी हो। क़ृषि‍क्षेत्र में बीज, उर्वरक, कीटनाशक यंत्र-संयंत्र-उपकरणों की बि‍क्री और उत्‍पादन, दूध, चीनी, बैकिंग ऋण एवं बचत, आवास, सहकारी उद्योग, खादय प्रसंस्‍करण, भंडारण, शि‍क्षा, प्रशि‍क्षण अस्‍पताल, चि‍कि‍त्‍सा केंद्र, मछली-कारोबार, सहकारी बाजार, परि‍वहन, सूचना एवं संचार तंत्र, खादी वस्‍त्र, बीमा आदि‍अनेकानेक क्षेत्रों में सहकारी संस्‍थाएं कार्यरत हैं। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जहां राष्‍ट्रीय कृषि‍एवं ग्रामीण वि‍कास बैंक (नाबार्ड), इफको, कृभको, अमूल नाफैड और राष्‍ट्रीय सहकारी वि‍कास नि‍गम (एनसीडीसी) जैसे बड़े सहकारी संस्‍थानों ने अपनी वि‍शेष पहचान बनायी है वहीं राज्‍य स्‍तर पर पंजाब में मार्कफैड, हरि‍याणा में हैफेड तमि‍लनाडु में टैनफैड और उ.प्र. में पराग डेरी कि‍सानों के बीच बहुत लोकप्रि‍य हैं।

दक्षि‍ण भारत में मत्‍स्‍य क्षेत्र की सहकारि‍ताओं के सदस्‍यों में 19 प्रतशित महि‍लाएं हैं। मत्‍स्‍य सहकारि‍ताएं अपनी शीर्ष संस्‍था फि‍शकोफैड से जुड़ी हुई हैं। वह उन्‍हें ऋण, नयी प्रौद्योगि‍की, मछली प्रसंस्‍करण और व्‍यापार संबंधी अनेक सुवि‍धाएं उपलब्‍ध कराती है। इसके साथ-साथ, ये शि‍क्षा-प्रशि‍क्षण से जुड़े कार्यक्रम और अनुसंधान परि‍योजनाएं संचालि‍त करती हैं। देशभर में श्रमि‍कों को ठेकेदारों के शोषण से बचाने के लि‍ए ठेका, श्रमि‍कों और वि‍निर्माण क्षेत्र के श्रमिकों की 39 हजार से अधिक सहकारी समितियां कार्यरत हैं। उनके जिला स्‍तरीय 215 संघ, राज्‍य स्‍तरीय 18 महासंघ और एक राष्‍ट्रीय स्‍तर का परि‍संघ हैं। वन क्षेत्रों में वनोपज के संकलन, प्रसंस्‍करण, भंडारण और वि‍पणन के क्षेत्र में वन श्रमि‍कों की 2700 से अधि‍क सहकारी समितियां कार्य कर रही हैं। आदि‍वासी क्षेत्रों में आदि‍वासी भी अनेक पराम्‍परागत वस्‍तुएं बनाते हैं। उनके कल्‍याण और वि‍कास में आदि‍वासी सहकारी वि‍पणन वि‍कास परि‍संघ अहम भूमि‍का नि‍भा रहा है।

सहकारी संस्‍थाओं की प्रबंध समि‍ति‍यों के सदस्‍यों, उनके संघों-महासंघों के अधि‍कारि‍यों और नि‍देशकों की शि‍क्षा और प्रशि‍क्षण के लि‍ए भारतीय राष्‍ट्रीय सहकारी संघ (एनसीयूआई) के तत्‍वावधान में राष्‍ट्रीय सहकारी प्रशि‍क्षण परि‍षद (एनसीसीटी) कार्यरत है। इस परि‍षद की सहायता के लि‍ए पुणे में बेमनि‍कोन के साथ-साथ, अखि‍ल भारतीय स्‍तर के 14 और क्षेत्रीय स्‍तर के पाँच संस्‍थान और स्‍थापि‍त कि‍ए गए हैं।

सहकारी क्षेत्र ने पि‍छले दो-तीन दशकों में महि‍ला सशक्‍तीकरण की धारणा, लक्ष्‍य और आवश्‍यकता को पूरा करने में भी सराहनीय भूमि‍का नि‍भायी है। इसकी देशभर में फैली छह लाख समि‍ति‍यों के सदस्‍यों में बड़ी संख्‍या में महि‍लाएं शामि‍ल हैं। अंतर्राष्‍ट्रीय सहकारी एलायंस का कथन है-जब महि‍लाएं आगे बढ़ती हैं, परि‍वार आगे बढ़ता है, गांव आगे बढ़ता है और इस तरह देश आगे बढ़ता है।

आंध्र प्रदेश सरकार ने स्‍वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को भी सहकारी संस्‍थाएं मानते हुए कानूनी प्रावधान करके उनके सहकारी संस्‍थाओं के रूप में पंजीयन की अनुमति‍दे दी है। देशभर में लगभग 48 लाख स्‍वयं सहायता समूह कार्यरत हैं। वर्ष 2010-11 में बैंकों ने उन्‍हें 312 अरब रूपये से अधि‍क का ऋण प्रदान कि‍या था। इन समूहों के सदस्‍यों में ज्‍यादातर महि‍लाएं हैं।

सहकारि‍ताएं अपने कुछ अलग मूल्‍यों-सि‍द्धांतों को लेकर चलती हैं। उन मूल्‍यों सि‍द्धांतों में मोटे तौर पर सह-अस्‍ति‍त्‍व की भावना, टीम भावना, से भी सदस्‍यों की सक्रि‍यता, सजगता, सच्‍चाई-ईमानदारी कर्मठता, आपसी वि‍श्‍वास, सौहार्द, पूर्ण पारदर्शिता, व्‍यावसायि‍कता, दूरदर्शिता और सवर्जन हि‍ताय, सर्वजन सुखाय की भावना निहि‍त हैं। अंतर्राष्‍ट्रीय सहकारी एलायंस (आईसीए) ने इनके अलावा सहकारि‍ताओं पर व्‍यावहारि‍क रूप से सात और सि‍द्धांत लागू कि‍ए हैं। पहला-बि‍ना कि‍सी भेदभाव के सहकारि‍ताओं में सबके लि‍ए स्‍वैच्‍छि‍क और खुली सदस्‍यता। दूसरा-मतदान का समान अधि‍कार सदस्‍यों द्वारा लोकतांत्रि‍क प्रबंधन और नि‍यंत्रण। तीसरा-सदस्‍यों का समान आर्थि‍क अंशदान और उसी के अनुपात में लाभांश प्राप्‍त  करना। चौथा- अन्‍य संगठनों, नि‍जी क्षेत्र की कंपनि‍यों के साथ सदस्‍यों की सहमति‍से ही संबंध बनाना अथवा समझौते करना। पाँचवाँ-सदस्‍यों, निर्वाचित प्रतिनि‍धि‍यों, नि‍देशकों और प्रबंधकों को शि‍क्षा और प्रशि‍क्षण की व्‍यवस्‍था करना। छठा अन्‍य अंतर्राष्‍ट्रीय सहकारि‍तों, संघों के साथ सहयोग तथा सातवां सामाजि‍क कर्तव्‍य बोध।

*लेखक एक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

 

वि.कसोटिया/राजीव-283पूरी सूची- 14.11.2012



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