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विशेष सेवा और सुविधाएँ25-जनवरी, 2011 18:04 IST

सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम के तकनीकी विकास के लिए नई और नवाचार योजनाएं
उदय कुमार वर्मा*

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देश की सकल औद्योगिक अर्थव्‍यवस्‍था में सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम (एमएसएमई) केंद्रीय भूमिका निभाता है। एमएसएमई क्षेत्र उद्यमशीलता के लिए प्रजनन भूमि की तरह होता है, जोकि अक्‍सर वैयक्तिक सृजनशीलता और नवाचार से संचालित होता है। यह क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्‍पाद यानी जीडीपी में 8 फीसदी, विनिर्मित उत्‍पादन में 45 और इसके निर्यात में 40 फीसदी का योगदान देता है। लगभग 2.6 करोड़ उद्यमों के जरिए यह क्षेत्र करीब 6 करोड़ लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। एमएसएमई क्षेत्र में वृहत उद्यमों की तुलना में रोजगार क्षमता और सकल वृद्धि बहुत ज्‍यादा होती है। साथ ही यह क्षेत्र समूचे विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में लगातार वृद्धि की ऊंची दर दर्ज करता रहा है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में इस क्षेत्र के विशाल योगदान को देखते हुए सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम मंत्रालय इसके संवर्द्धन और विकास हेतु विभिन्‍न योजनाओं और कार्यक्रमों का कार्यान्‍वयन करता रहा है। ये योजनाएं आधारभूत ढांचे, प्रौद्योगिकी, साख और विपणन समर्थन सहित एमएसएमई परिचालन के सभी पक्षों को सम्मिलित करता है।

तेजी से इस तथ्‍य को मान्‍यता मिल रही है कि साख, विपणन आदि महत्‍वपूर्ण है, पर निर्णायक तत्‍व जो विकास प्रभावित करता वह प्रौद्योगिकी है। वैश्‍वीकृत प्रतिस्‍पर्द्धा के मौजूदा आर्थिक परिदृश्‍य में प्रौद्योगिकीय पक्ष ही विजेताओं का निर्धारण करेगा। इस सच्‍चाई के आलोक में एमएसएमई मंत्रालय इस क्षेत्र के प्रौद्योगिकी विकास के लिए कई कार्यक्रमों और योजनाओं की शुरुआत कर रहा है। इसने हाल ही में राष्‍ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्‍पर्द्धा कार्यक्रम (एनएमसीपी) के तहत 10 नवाचार योजनाओं को शुरू किया है। भारतीय सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यमों के बीच वैश्विक प्रतिस्‍पर्द्धा विकसित करने के लिए ये योजनाएं इस क्षेत्र में निर्माण के समूचे विस्‍तार को सम्मिलित करती हैं।

अपव्‍यय रोकथाम विनिर्माण प्रतिस्‍पर्द्धा योजना

विनिर्माण अपव्‍यय घटाने के लिए 2009 में अपव्‍यय रोकथाम विनिर्माण प्रतिस्‍पर्द्धा योजना शुरू की गई। इसके तहत सरल तकनीक अपनाई जाती है, जो अपव्‍यय की पहचान करके और अपशिष्‍ट खत्‍म करके उत्‍पादन प्रणाली को कारगर बनाती है। यह योजना सार्वजनिक-निजी भागीदारी में शुरू की गई है। शुरू में, अपव्‍यय रोकथाम विनिर्माण तकनीक को परीक्षण के तौर पर 100 छोटे समूहों में शुरू किया जा रहा है। विभिन्‍न उद्योग समूहों में एमएसएमई इकाइयों द्वारा 70 से अधिक विशेष उद्देश्‍य उपक्रमों को स्‍थापित किया गया है और इसे कार्यान्वित करने के लिए 42 अपव्‍यय रोकथाम सलाहकार का चयन किया गया है।

डिजाइन क्‍लीनिक योजना

डिजाइन क्‍लीनिक योजना एमएसएम उद्यमों में डिजाइन विशेषज्ञों को एक सामान्‍य प्‍लेटफॉर्म उपलब्‍ध कराती है, ताकि एमएसएम उद्यमों को विशेषज्ञों की राय उपलब्‍ध हो और उन्‍हें रियल-टाइम डिजाइन समस्‍याओं का प्रभावी लागत समाधान उपलब्‍ध मिले। यह योजना 2010 में शुरू हुई। इसके तहत दो बड़े भाग डिजाइन जागरुकता और डिजाइन प्रोजेक्‍ट फंडिंग आते हैं। पहले चरण के तहत विभिन्‍न गतिविधियां मसलन सेमिनार, कार्यशाला और नैदानिक अध्‍ययन किए जाते हैं। वहीं डिजाइन प्रोजेक्‍ट फंडिंग के तहत छात्रों की परियोजनाएं, सलाहकार या डिजाइनर और सलाहकारी संस्‍थाओं को सरकारी अनुदान से परियोजना लागत की 60 प्रतिशत राशि देकर सहायता की जाती है। इस योजना को शुरू में 200 एमएसएमई समूहों में लागू किया जाएगा। 99 समूहों में अब तक 43 सेमिनार आयोजित हुए हैं और 15 डिजाइन परियोजनाएं मंजूर हुई हैं।

विपणन सहायता और प्रौद्योगिकी उन्‍नयन

विपणन में प्रतिस्‍पर्द्धा के लिए विपणन सहायता और प्रौद्योगिकी उन्‍नयन योजनाओं के जरिए सुधार की मांग की जा रही है। पैकेजिंग का प्रौद्योगिकी उन्‍नयन, आधुनिक विपणन तकनीकी का विकास, प्रतियोगिता का अध्‍ययन, राज्‍य या जिला प्रदर्शनी, कंपनी प्रशासन गतिविधि आदि इस योजना की मुख्‍य गतिविधियों में शामिल हैं। पिछले साल शुरू की गई इस योजना के तहत पैकेजिंग पर अध्‍ययन करने के लिए 10 उत्‍पाद समूहों की पहचान की गई है। इसके अलावा उद्योग मेलों और प्रदर्शनियों में भाग लेने के लिए 140 इकाइयों की पहचान की गई है।

प्रौद्योगिकी और गुणवत्ता उन्‍नयन

भारत के एमएसएमई क्षेत्र को उनकी प्रौद्योगिकियों के उन्‍नयन के प्रति संवेदनशील बनाने का लक्ष्‍य है, ताकि उन्‍हें प्रौद्योगिकी और गुणवत्ता उन्‍नयन समर्थन मिल सके। वैश्विक रूप से प्रतिस्‍पर्द्धी बनने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्‍सर्जन में कमी, वैश्विक मानकों के अनुरूप अन्‍य प्रौद्योगिकियों को अपनाना, गुणवत्ता और उत्‍पादन लागत में सुधार आदि अपेक्षित है। इस योजना के तहत जो प्रमुख गतिविधियां निर्धारित की गई हैं उनमें ऊर्जा दक्षता/स्‍वच्‍छ विकास हस्‍तक्षेपों के लिए एमएसएमई समूहों का क्षमता विकास, एमएसएमई क्षेत्र में ऊर्जा दक्ष प्रौद्योगिकियों का इस्‍तेमाल, कार्बन क्रेडिट एकत्रीकरण केंद्र की स्‍थापना एवं राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍थाओं से उत्‍पाद प्रमाणन लाइसेंस हासिल करना आदि हैं।

आईसीटी को प्रोत्‍साहन

‘सूचना और संचार उपकरणों को प्रोत्‍साहन’ योजना की परिकल्‍पना के अनुसार, बेहतर उत्‍पादन गुणवत्ता और निर्यात क्षमता वाले एसएमई समूहों की पहचान कर देशी और विदेशी बाजारों में प्रतिस्‍पर्द्धी बनाने के लिए उसे आईसीटी के इस्‍तेमाल के लिए प्रोत्‍साहन और सहयोग दिया जाएगा। इस योजना के तहत निर्धारित गतिविधियों में आईसीटी हस्‍तक्षेपों के लिए लक्षित समूहों की पहचान, समूहों के लिए वेबसाइटों का निर्माण, आईसीटी में एमएसएमई कर्मचारियों की क्षमता का विकास, एमएसएमई के लिए स्‍थानीय सॉफ्टवेयर का विकास, ई-कैटेलॉग का निर्माण, ई-कॉमर्स और वैश्विक बाजारों में पहुंचने के लिए एमएसएमई समूहों की वेबसाइटों को राष्‍ट्रीय स्‍तर की वेबसाइटों से जोड़ना आदि शामिल हैं। इस साल शुरू इस योजना के तहत शुरू में 100 एमएसएमई समूहों को जोड़ा जाएगा।

टूलिंग और प्रशिक्षण केंद्र

मिनी टूल रूम और प्रशिक्षण केंद्र की स्‍थापना की योजना के अनुसार निजी क्षेत्र में टूलिंग और प्रशिक्षण सुविधा के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत 15 नए मिनी टूल रूम स्‍थापित किए जाएंगे। इन मिनी टूल कक्षों को स्‍थापित करने के लिए बोली लगाकर उद्यमियों और संगठनों का चयन किया जाएगा। सरकारी मदद प्रति इकाई 9 करोड़ रुपये तक सीमित रहेगी। कुल 210 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना में 135 करोड़ रुपये की सरकारी मदद मंजूर की गई थी। इस योजना का उद्देश्‍य बेहतर उपकरणों के डिजाइन व निर्माण और संबंधित क्षेत्रों में प्रशिक्षण सुविधा देने के लिए निजी क्षेत्र को सक्षम बनाकर एमएसएम उद्यमों को अधिक प्रौद्योगिकीय समर्थन उपलब्‍ध कराना है। यह योजना तीन मॉडलों यानी केंद्रीय सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल, राज्‍य सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल और केंद्र-राज्‍य मॉडल में लागू की जाएगी।

उत्‍पादों की गुणवत्ता में सुधार

गुणवत्ता प्रबंधन मानकों (क्‍यूएमएस) और गुणवत्ता प्रौद्यो‍गिकी उपकरणों (क्‍यूटीटी) के जरिए विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने की योजना 2009 में शुरू की गई थी। इस योजना का लक्ष्‍य एमएसई क्षेत्र में गुणवत्ता सुधारना और इस क्षेत्र में गुणवत्ता के प्रति जागरुकता विकसित करना है। इस योजना की मुख्‍य गतिविधियों में तकनीकी संस्‍थानों (आईटीआई या पॉलीटेक्निक) के लिए उपयुक्‍त मॉड्यूल का प्रारंभ, एमएसई के लिए जागरुकता अभियान चलाना, चुनिंदा एमएसई में क्‍यूएमएस और क्‍यूटीटी लागू करना, अंतरराष्‍ट्रीय अध्‍ययन मिशनों का निरीक्षण आदि शामिल हैं।

बौद्धिक संपदा अधिकार को लेकर जागरुकता

भारतीय एमएसएम उद्यमों को सक्षम बनाने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार पर जागरुकता विकसित करने की योजना लॉन्‍च की जा चुकी है। इसका लक्ष्‍य वैश्विक नेतृत्‍व की स्थिति प्राप्‍त करना और नवाचार परियोजनाओं पर बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रभावी इस्‍तेमाल में भारतीय एमएसएम उद्यमों को दक्ष बनाना है। इस योजना की मुख्‍य बातें इस प्रकार हैं-आईपीआर पर जागरुकता कार्यक्रम, चयनित क्‍लस्‍टर या औद्योगिक समूहों के लिए परीक्षण अध्‍ययन करना, सेमिनार, कार्यशाला आदि का आयोजन, विशेषीकृत प्रशिक्षण, पेटेंट या जीआई पंजीकरण पर अनुदान के लिए सहायता, आईपी सुविधा केंद्र की स्‍थापना और अंतरराष्‍ट्रीय एजेंट से विमर्श करना आदि। इन पहलों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी में लागू किया जाएगा। 18 सुविधा केंद्र स्‍थापित करने के साथ करीब 112 जागरुकता कार्यक्रमों और 35 सेमिनारों का आयोजन किया गया है।

बार कोड प्रमाणन

‍एमएसएमई योजनाओं को वि‍पणन सहायता/समर्थन देने का उद्देश्य बार कोड पंजीकरण को लोकप्रिय बनाना और लघु एवं सूक्ष्‍म विनिर्माण उद्यमों को बार कोड प्रमाणन को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए प्रोत्‍साहित करना है। इसके साथ ही पूरी दुनिया में उनके मूल्‍यवर्द्धित उत्‍पादों की बिक्री और ज्‍यादा निर्यात मूल्‍य प्राप्‍त करना है। यह घरेलू विपणन में भी मदद करता है। इस योजना के तहत पहले तीन साल तक बार कोड प्रमाणन से हासिल होने वाली फीस का 75 फीसदी भाग सूक्ष्‍म और लघु उद्यमों के बीच बांटा जा रहा है। अब तक इस योजना का लाभ 101 उद्यमों को मिल चुका है।

अनूठे कारोबारी विचारों का पोषण

इन्‍क्‍यूबेटर योजना के जरिए एमएसएम उद्यमों के उपक्रम संबंधी और प्रबंधकीय विकास को समर्थन देने का उद्देश्‍य अनूठे कारोबारी विचारों को पोषित करना है, जिसका वाणिज्यिक इस्‍तेमाल साल के भीतर हो सके। इसके तहत विभिन्‍न संस्‍थानों जैसे इंजीनियरिंग कॉलेजों, प्रबंध संस्‍थानों, शोध प्रयोगशालाओं आदि को प्रत्‍येक अनूठे कारोबारी विचारों के लिए 6.25 लाख रुपये तक की राशि दी जाती है। कारोबार की सफल शुरुआत के लिए इन्‍क्‍यूबेटर अन्‍य एजेंसियों को तकनीकी/मार्गदर्शन, कार्यशाला और प्रयोगशाला सहायता एवं संपर्क मुहैया कराता है और उद्यम स्‍थापित करने में उद्यमियों को मार्गदर्शन करता है। इस योजना के तहत अब तक 76 कारोबारी इनक्‍यूबेटर स्‍थापित किए गए हैं और 190 विचार प्रस्‍तावों को मंजूरी दी गई है।

उत्‍पादकता बढ़ाने के लिए समूह विकास कार्यक्रम (सीडीपी)

सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) ने उत्‍पादकता और प्रतिस्‍पर्द्धा बढ़ाने के साथ देश के सूक्ष्‍म और लघु उद्यमों के क्षमता विकास के लिए बतौर मुख्‍य रणनीति समूह विकास कार्यक्रम (क्‍लस्‍टर डेवलपमेंट प्रोग्राम) स्‍वीकार किया है। सीडीपी के कदमों को सूक्ष्‍म और लघु उद्यम-समूह विकास कार्यक्रम (एमएसई-सीडीपी) के तहत कार्यान्वित किया जा रहा है।

एमएसई-सीडीपी के तहत वित्तीय मदद दी जाती है। ‘निदान अध्‍ययन रिपोर्ट’ तैयार करने के लिए अधिकतम अनुदान 2.5 लाख रुपये, प्रति समूह अधिकतम परियोजना लागत 25 लाख रुपए के लिए मंजूर राशि का 75 प्रतिशत (उत्तर-पूर्व और पहाड़ी राज्‍यों में 90 प्रतिशत) सॉफ्ट इंटरवेंशन के लिए, विस्‍तृत परियोजना रपट तैयार करने के लिए 5 लाख रुपए, प्रति समूह अधिकतम परियोजना लागत 15 करोड़ रुपए के लिए मंजूर राशि का 70 प्रतिशत सामान्‍य सुविधा केंद्र के लिए (उत्तर-पूर्व और पहाड़ी राज्‍यों में 90 प्रतिशत), प्रति समूह अधिकतम परियोजना लागत 10 करोड़ रुपए (जमीन की लागत छोड़कर) के लिए मंजूर राशि का 60 प्रतिशत बुनियादी ढांचा विकास के लिए (उत्तर-पूर्व और पहाड़ी राज्‍यों में 80 प्रतिशत) दिया जाता है। इसे लॉन्‍च करने के बाद अब तक 470 से ज्‍यादा समूह एमएसई-सीडीपी योजना के तहत आ चुके हैं। 124 से ज्‍यादा प्रस्‍ताव बुनियादी ढांचा विकास के लिए जा चुके हैं। इन परियोजनाओं में छोटे और सूक्ष्‍म इकाइयों को अब तक 10,972 भूखंड आवंटित हो चुके हैं। इससे कुल 37,555 लोगों को रोजगार मिला है। क्‍लस्‍टर विकास का तरीका बहुत कारगर रहा है। एमएसई-सीडीपी के दिशानिर्देशों में कुछ सुधारों और विभिन्‍न अंशधारकों के बीच बढ़ी जागरुकता के बाद यह योजना निकट भविष्‍य में बड़ी छलांग के लिए तैयार है।

पीएमईजीपी के जरिए रोजगार सृजन

एमएसएम उद्यम रोजगार सृजन में केंद्रीय भूमिका निभाता है। इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी रोजगार सृजन योजना को अगस्‍त 2008 में शुरू किया गया। इसका कुल योजना परिव्‍यय 4,485 करोड़ रुपये है, जिससे ग्‍यारहवीं पंचवर्षीय योजना के शेष चार सालों (2008-09 से 2011-12) में 37.38 लाख रोजगार मिलेगा। इस कार्यक्रम के तहत, सेवा क्षेत्र में सूक्ष्‍म उद्यम स्‍थापित करने के लिए 10 लाख रुपये और विनिर्माण क्षेत्र में ऐसे उद्यम की स्‍थापना के लिए 25 लाख रुपये तक की वित्तीय मदद प्रदान की जाती है। यह मदद ग्रामीण क्षेत्रों में परियोजना लागत का 25 फीसदी तक सब्सिडी के रूप में (कमजोर तबके सहित विशेष श्रेणी के लिए 35 प्रतिशत) और शहरी क्षेत्रों में परियोजना लागत का 15 प्रतिशत तक सब्सिडी के रूप में (कमजोर तबके सहित विशेष श्रेणी के लिए 25 प्रतिशत) दी जाती है। यह कार्यक्रम खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के जरिए लागू की जाती है।

इस परियोजना को जनता का जबरदस्‍त समर्थन मिला है। 2009-10 के दौरान विभिन्‍न कार्यान्‍वयन संस्‍थाओं को 3.20 लाख आवेदन हासिल हुए। इनमें से 67,473 मामलों को बैंकों ने मंजूर किया है। 39,335 आवेदनों के लिए राशि वितरित कर दी गई है। इनमें केवल 742.76 करोड़ रुपये की राशि मार्जिन मनी सब्सिडी उपयोग हुई है। अनुमानित रोजगार सृजन 4.42 लाख का है। मौजूदा वर्ष में इस कार्यक्रम का प्रदर्शन सुधरने का अनुमान है।

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*सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम मंत्रालय के सचिव वि. जोशी/विनोद/चन्‍दन/बिष्‍ट/277
(Release ID 7668)


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